तेजस्वी- नीतीश कैबिनेट में अगड़ी जातियों एवं यादवों का बोल बाला



हल ही में अपने ए टू जेड के नारे को हवा देने वाले तेजस्वी यादव ने इस बार अपने कुनबे में नया प्रयोग को इजहार किया है। अपने इस प्रयोग से उन्हें उम्मीद है की बिहार में अपनी पार्टी के समीकरण को वो नया स्वरुप दे पाएंगे। 


 

भूमिहारों पर है फोकस

बोचहा उपचुनाव, एमएलसी चुनाव और अब कैबिनेट का गठन, इतना ही नहीं, इनके बीच में की गयी सभाएं राष्ट्रीय जनता दाल एवं भूमिहार समाज के बीच में एक नयी केमिस्ट्री की कहानी बयां कर रही है। खबर तो यह भी है की तेजस्वी यादव सीटवार भी भूमिहार समाज के लोगों के एक हिस्से का वोट लेने की योजना पर भी काम कर रहे हैं। 

दोनों तरफ से मिल रहे इशारे
और मजे की बात तो यह है की यह प्रेम सिर्फ एक तरफ़ा नहीं दिख रहा।  बोचहा उपचुनाव के वक़्त भी इसका एक सैंपल हमें देखने को मिला है जब तथाकथित रूप से भूमिहार समाज के एक बड़े वर्ग ने राजद के लिए मतदान किया। कई जगहों पर भूमिहार यह कहते हुए भी दिखाई पड़ते हैं की अब राष्ट्रीय जनता दाल उनके लिए अछूत नहीं रही और सही कैंडिडेट होने पर राजद को वोट देने में उन्हें कोई समस्या नहीं है।

अल्पसंख्यक को मिला उचित सम्मान
भाजपा के द्वारा सुनियोजित तरीके से राजनीती में शून्यकरण का देश भर में शिकार  हुए अल्पसंख़्यक के लिए कम से कम बिहार में ये रहत भरी खबर आयी है, और संख्या के अनुसार उचित सम्मान उन्हें बिहार के मंत्रिमंडल में मिला है  । बिहार में अल्पसंख्यक की कुल संख्या 15 -17 % के आस पास है।  इस लिहाज से 31  के मंत्रिमंडल में इन्हे 5  जगह मिलनी चाहिए थी, जो की मिली भी है। यह जानकारी में बात होनी चाहिए की 5 में से जदयू में से 1, राजद में से 3 एवं कांग्रेस में से 1 अल्पसंख्यक मंत्री बने हैं।  

अगड़ी जाति को ज्यादा जगह
इस बिहार मंत्रिमंडल में 3 मंत्री राजपूत जाति से, जिसमे से 2 जदयू(1  निर्दलीय पर जदयू को समर्थन देने वाले) से है और 1 राजद से है।  एक ब्राम्हण जाति की जदयू से है एवं राजद और जदयू से एक-एक मंत्री भूमिहार जाति से हैं।  बिहार में  अगड़ी जातियों की संख्या भी लगभग अल्पसंख्यक जितनी ही है। इस हिसाब से इनके 5  मंत्री होने चाहिए थे, पर बने है 6 ।  अंतिम में हम देखेंगे की इसके लिए किस सामाजिक वर्ग की क़ुरबानी ली गयी है। 

कुर्मी-कोयरी को भी संख्या के हिसाब से जगह
पिछड़े वर्ग में यादव जाति के अलावा किसान आधारित 2 और जातियां हैं - कुर्मी एवं कुशवाहा।  इन 2 जातियों की कुल संख्या लगभग 10 % है और 31 के मंत्री मंडल में भी इसी हीअसब से इनमे से 3 को जगह दी गयी है।  हालाँकि इसमें से कोयरी की ज्यादा संख्या होने के बावजूद भी उनका एक ही मंत्री है।  पर अगर इन दोनों को एक ही सामाजिक वर्ग माने तो इनको संख्या के हिसाब से जगह दी गयी है। 

दलित को भी मिला उचित सम्मान
इस सरकार में 31 में से 5 मंत्री दलित वर्ग के हैं जिनकी संख्या भी समाज में 15 % के करीब है। इस लिहाज से दलित समुदाय को उचित सम्मान मिलता हुआ दिखाई पड़ता है।  इतना ही नहीं, इस मंत्री मंडल में दलित जातियों में भी सभी जातियों को जगह मिलता हुआ दिखाई पद रहा, जो की अपने आप में भी एक सकारात्मक पहल है। 

सबसे भारी प्रतिनिधित्व यादवों का
बिहार में  यादवों की संख्या भी लगभग 15 % के आस पास है और इस हिसाब से 5 यादवों को मंत्रिमंडल में जगह दी जानी चाहिए।  पर इस बार 8 मंत्री यादव जाति से बनाये गए हैं जो की संख्या के लिहाज से ज्यादा है। पर यह भी बात सत्य है की इन पार्टियों की जीत में यादव जाति की वोटरों का योगदान भी काफी है।  लेकिन इस हिसाब से अल्प्संक्यक को भी ज्यादा जगह दी जानी चाहिए थी।  परन्तु ऐसा नहीं हुआ। 

बलि का बकरा बना अति-पिछड़ा वर्ग
बिहार में हिन्दू अति पिछड़ा की आबादी 25 % के आस पास है।  इस हिसाब से 8 लोग अति-पिछड़ा समाज से मंत्री-मंडल में शामिल होने चाहिए थे।  पर इस मंत्री मंडल में सिर्फ 4 लोग ही शामिल हुए हैं और इनके हिस्से की क्रीम काटकर यादवों एवं अगड़ों को दे दी गयी है। नोट करने वाली बात ये है की जदयू के 11 में से 2  मंत्री अति पिछड़ा समाज के है एवं राजद के 16 में से 2। 

न्याय की बात, देश की बात
अति पिछड़ा की राजनीति के नायक कर्पूरी ठाकुर के लिगेसी को क्लेम करने वाली पार्टियां को इस बारे में विचार करना चाहिए की समाज के एक कमजोर वर्ग को वह अपनी विधायिका, अपनी पार्टी एवं अपने मत्रिमंडल में पर्याप्त जगह दें ताकि इस वंचित वर्ग को भी देश को आगे बढ़ने में अपना योगदान देने का पूर्ण अवसर प्राप्त हो एवं देश की प्रतिभाशाली अग्रणी में और भी लोग जुड़ें और देश को पुरे विश्व में नंबर 1  बनायें। 

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